इस दूसरी बिक्री से बैंकों को 4,600 करोड़ रुपये की नकद रिकवरी और हुई।… — 360 Degrees — TG.ME

इस दूसरी बिक्री से बैंकों को 4,600 करोड़ रुपये की नकद रिकवरी और हुई। इन दोनों बिक्रियों को मिलाकर कुल 8,824 करोड़ रुपये की सीधी नकदी बैंकों और फंड्स को मिल गई।
अब जरा गणित समझिए। यूपीए सरकार में लिए गए 16,500 करोड़ रुपये के मूल कर्ज में से यह 8,824 करोड़ रुपये घटा दें, तो बैंकों का मूल बकाया घटकर मात्र 7,676 करोड़ रुपये रह गया।

रिकवरी का दूसरा चरण: प्रोजेक्ट्स की नीलामी और मूलधन की 100% वापसी

रिकवरी का पहिया यहीं नहीं रुका। 2020 और 2021 के बीच, आईबीसी (IBC) की कार्यवाही से अपनी अन्य कंपनियों को बचाने के लिए एस्सेल ग्रुप ने अपने उन प्रोजेक्ट्स को बेचना शुरू किया, जिनके लिए असल में यह कर्ज लिया गया था।

जुलाई 2020 में एस्सेल ग्रीन एनर्जी के 205 मेगावाट क्षमता के चालू सोलर प्रोजेक्ट्स को अडानी ग्रीन एनर्जी ने खरीद लिया। इस सौदे से बैंकों का 1,300 करोड़ रुपये का कर्ज सीधे अडानी ग्रुप में ट्रांसफर हो गया।

मार्च 2021 में, एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट्स की विशाल 'वरूरा-कुरनूल ट्रांसमिशन लाइन' को अडानी ट्रांसमिशन लिमिटेड ने खरीद लिया। इससे बैंकों का 3,370 करोड़ रुपये का लोन चुकता हो गया।

इसी दौरान, कई बड़े नेशनल हाईवे और टोल रोड प्रोजेक्ट्स को 'क्यूब हाईवेज' और NIIF जैसे वैश्विक निवेशकों को बेचा गया। इससे बैंकों का लगभग 4,130 करोड़ रुपये का कर्ज और निपटाया गया।

इन इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की बिक्री से बैंकों का कुल मिलाकर लगभग 8,800 करोड़ रुपये का कर्ज सीधे चुकता या ट्रांसफर हो गया।

अब फिर से गणित देखिए। पिछले चरण में मूल बकाया 7,676 करोड़ बचा था। इसमें से जैसे ही यह 8,800 करोड़ की रिकवरी हुई, बैंकों का पूरा का पूरा 16,500 करोड़ का मूलधन 100 प्रतिशत वसूल हो गया।

यही नहीं, अपना पूरा मूलधन वापस पाने के बाद भी बैंक अब 1,124 करोड़ रुपये के मुनाफे (सरप्लस) में आ गए।

रिकवरी का तीसरा चरण: आक्रामक जब्ती और हजारों करोड़ की एक्स्ट्रा वसूली

मूल रकम पूरी तरह वापस आने के बावजूद भी बैंकों और मोदी सरकार के सिस्टम ने कोई रियायत नहीं बरती। उन्हें अटके हुए समय का मुआवजा भी चाहिए था।

साल 2020 से 2023 के बीच, यस बैंक और इंडसइंड बैंक ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने सुभाष चंद्रा की 'डिश टीवी इंडिया लिमिटेड' (24.19% प्रमोटर हिस्सेदारी) और 'सिटी नेटवर्क्स' के गिरवी रखे शेयरों को सीधे जब्त कर लिया।

बैंकों ने सुभाष चंद्रा से बिना पूछे इन जब्त शेयरों को खुले शेयर बाजार में बेच डाला। इस आक्रामक जब्ती से बैंकों ने 2,800 करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी और वसूल ली।

इसके बाद, दिसंबर 2023 में यस बैंक के एक पुराने और विवादित खाते को भी जेसी फ्लावर्स एआरसी (JC Flowers ARC) के जरिए 1,500 करोड़ रुपये देकर वन-टाइम सेटलमेंट के तहत निपटाया गया।

अब फाइनल गणित समझिए। सरप्लस के 1,124 करोड़ + शेयरों की जब्ती से 2,800 करोड़ + जेसी फ्लावर्स सेटलमेंट के 1,500 करोड़। यानी बैंकों ने 16,500 करोड़ के मूलधन के ऊपर 5,424 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वसूली कर ली।

अब तक कुल रिकवरी हुई 21924 करोड़ !!

तो क्या है 6 करोड़ रुपये के सेटलमेंट का सच?

कुल मिलाकर इस पूरी गाथा का निष्कर्ष बिल्कुल साफ है। यूपीए सरकार के ढुलमुल सिस्टम में जो 16,500 करोड़ रुपये का मूल कर्ज लिया गया था, वह मोदी सरकार के सख्त बैंकरप्सी कानून के तहत पाई-पाई वापस आ चुका है। मतलब आप कह सकते हैं कि मोदी जी के मित्र यदि सुभाष चंद्रा थे तो भी उन्होंने कोई ढिलाई नहीं बरती !!

जिस 6 करोड़ रुपये के सेटलमेंट की अफवाह सोशल मीडिया पर उड़ाई जाती है, वह कर्ज की माफी नहीं है। वह केवल उन दो-चार शेल कंपनियों (SPVs) का मामला है जो जमीन पर पूरी तरह कबाड़ हो चुकी थीं और जिनकी वास्तविक कीमत शून्य हो गई थी।

दिवाला कानून के तहत, उन बर्बाद कंपनियों में सुभाष चंद्रा की जो 'व्यक्तिगत गारंटी' (Personal Guarantee) फंसी थी, उसे उनकी निजी हैसियत का आकलन करके निपटाया गया, जिसको 80% लेंडर्स ने इस निर्णय के पक्ष में वोट किया । 2019 से 2021 तक सब कुछ बिक जाने के बाद उनकी निजी हैसियत केवल 6.5 करोड़ आंकी गई, जिसे देकर उन्हें सिर्फ उस कानूनी गारंटी से मुक्त किया गया।

अगर आईबीसी (IBC) न होता तो क्या होता?
अगर आज मोदी सरकार का यह सख्त आईबीसी (IBC) कानून न होता, तो हालात बिल्कुल वैसे ही होते जैसे 2014 से पहले हुआ करते थे।

बैंक सालों-साल सिविल अदालतों और डीआरटी (DRT) के चक्कर काटते रहते। सुभाष चंद्रा का रुतबा वैसा ही बना रहता और वे 'ज़ी एंटरटेनमेंट' के मालिक बने रहते।

और सबसे बड़ी बात, देश की जनता और बैंकों को अपने 16,500 करोड़ रुपये के उस पूरे मूलधन से हमेशा के लिए हाथ धोना पड़ता, जिसे आज पूरी तरह वसूल लिया गया है।
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August 28, 2026 2.5K 9 13