राजनीति और व्यापार के गलियारों में अक्सर एक कहानी बहुत जोर-शोर से… — 360 Degrees — TG.ME

राजनीति और व्यापार के गलियारों में अक्सर एक कहानी बहुत जोर-शोर से गूंजती है कि मीडिया के बेताज बादशाह सुभाष चंद्रा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी हैं।

लेकिन जब बैंकों की कर्ज वसूली की बात आई, तो यह तथाकथित ‘दोस्ती’ भी उनके साम्राज्य को टूटने से नहीं बचा सकी। मोदी सरकार के सिस्टम ने एक-एक पाई वसूलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

सोशल मीडिया पर आज जो नैरेटिव फैलाया जा रहा है, उसकी सच्चाई किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। यह कहानी पूरी तरह से उस 16,500 करोड़ रुपये के इर्द-गिर्द घूमती है, जो असल में बैंकों से मूल कर्ज (Principal Amount) के रूप में लिया गया था।

आइए, इस पूरे वित्तीय चक्रव्यूह को तारीखों, आंकड़ों और ठोस तथ्यों के साथ एक-एक करके समझते हैं।
सपनों की उड़ान और यूपीए सरकार का दौर
इस कहानी की शुरुआत मोदी सरकार में नहीं, बल्कि डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए (UPA) सरकार के दौरान साल 2007-2008 में हुई थी।

सुभाष चंद्रा केवल टीवी चैनलों तक सीमित नहीं रहना चाहते थे। उन्होंने एक बेहद बड़ा और जोखिम भरा विजन देखा। उन्होंने तय किया कि एस्सेल ग्रुप देश भर में नेशनल हाईवे बनाएगा, विशाल सोलर पावर प्लांट लगाएगा और बिजली के बड़े-बड़े तारों का जाल बिछाएगा।

उस दौर में बैंकिंग नीतियां काफी लचीली थीं। बड़े कॉरपोरेट घरानों को केवल उनके चेहरे, नाम और रुतबे के आधार पर हजारों करोड़ के लोन आसानी से मिल जाया करते थे।

सुभाष चंद्रा की विशेषज्ञता मीडिया में थी, फिर भी यूपीए सरकार के कार्यकाल में भारतीय स्टेट बैंक (SBI), पंजाब नेशनल बैंक, केनरा बैंक, और आईडीबीआई (IDBI) बैंक के कंसोर्टियम ने उन्हें भारी-भरकम इन्फ्रास्ट्रक्चर लोन बांट दिए।

इसके साथ ही, यस बैंक और कई बड़े म्यूचुअल फंड्स (जैसे फ्रैंकलिन टेम्पलटन, आदित्य बिड़ला, कोटक, एचडीएफसी) ने भी उनके एजुकेशन बिजनेस (Zee Learn) और केबल नेटवर्क (Siti Networks, Dish TV) के लिए तिजोरियां खोल दीं।
इन सभी प्रोजेक्ट्स को मिलाकर एस्सेल ग्रुप ने विभिन्न बैंकों से कुल 16,500 करोड़ रुपये का वास्तविक मूल कर्ज (Principal Amount) उठाया।

विजनरी सपना, जो सिस्टम की भेंट चढ़ गया
सुभाष चंद्रा की नीयत इन प्रोजेक्ट्स को विश्वस्तरीय बनाने की थी। लेकिन साल 2011 से 2014 के बीच देश में 'पॉलिसी पैरालिसिस' (नीतिगत पंगुता) का भयंकर दौर शुरू हो गया।

एस्सेल ग्रुप ने बैंकों से मिले हजारों करोड़ रुपये जमीन पर तो लगा दिए, लेकिन प्रोजेक्ट्स लालफीताशाही में उलझ गए। कहीं पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी नहीं मिली, तो कहीं जमीन अधिग्रहण के विवादों में काम रुक गया।

एक विजनरी बिजनेसमैन का शानदार सपना उस दौर के सुस्त सिस्टम और सरकारी लेटलतीफी का शिकार हो गया। सालों तक प्रोजेक्ट्स लटके रहे।

इन प्रोजेक्ट्स से एक रुपये की भी कमाई शुरू नहीं हुई, लेकिन बैंकों का मीटर चालू रहा। कुल 16,500 करोड़ रुपये का वह भारी-भरकम निवेश पूरी तरह से जमीन पर अटक गया और ग्रुप भयंकर वित्तीय संकट में फंस गया।

मोदी सरकार का आगमन और आईबीसी (IBC) का खौफ
साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए, तो लोगों को लगा कि सुभाष चंद्रा के 'राजनीतिक संपर्कों' के कारण उनके 16,500 करोड़ रुपये के कर्ज को आसानी से रफा-दफा या रीस्ट्रक्चर कर दिया जाएगा।

लेकिन 2016 में मोदी सरकार ने 'इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड' (IBC) लागू कर दिया। इस एक कानून ने देश के कॉरपोरेट इतिहास को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
इस सख्त कानून ने बड़े-बड़े उद्योगपतियों के मन में यह खौफ पैदा कर दिया कि अगर बैंकों का पैसा नहीं लौटाया, तो प्रमोटर को अपनी जीवन भर की मेहनत से बनाई गई कंपनी गंवानी पड़ेगी। कंपनी नीलाम हो जाएगी और प्रमोटर सड़क पर आ जाएगा।

इसी खौफ और दबाव में भारत के कॉरपोरेट इतिहास की सबसे ऐतिहासिक वसूली का वह दौर शुरू हुआ, जिसने सुभाष चंद्रा के हाथों से उनका सबसे प्यारा साम्राज्य हमेशा के लिए छीन लिया।

पहला चरणः

बैंकरप्सी कानून की तलवार लटकते ही बैंकों ने सुभाष चंद्रा की गर्दन पकड़ ली। दबाव इतना भयानक था कि सितंबर 2019 में सुभाष चंद्रा को भारी मन से अपने जीवन की सबसे बड़ी कमाई, 'ज़ी एंटरटेनमेंट' (ZEEL) की 11 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचनी पड़ी।
यह हिस्सेदारी इनवेस्को ओपेनहाइमर फंड को बेची गई, जिससे एकमुश्त 4,224 करोड़ रुपये जुटाए गए। यह सारा पैसा सीधे म्यूचुअल फंड्स और बैंकों के खातों में जमा करा दिया गया।

लेकिन इतने से बात नहीं बनी। लेंडर्स का दबाव और बढ़ा। ठीक दो महीने बाद, 20 नवंबर 2019 को, सुभाष चंद्रा को अपनी अतिरिक्त 15.7 प्रतिशत हिस्सेदारी विदेशी संस्थागत निवेशकों (GIC, ब्लैकरॉक आदि) को बेचनी पड़ी।
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August 28, 2026 2.4K 13