ज़ुह्द किसे कहते हैँ इसका क्या माना है ? ज़ुह्द (الزُّهْد) का मत़लब है: दुनिया से दिल का बे-रग़्बत होना, यानी दुनिया की चीज़ों को मक़सद-ए-ज़िंदगी न बनाना और आख़िरत को तरजीह देना। इसका मतलब यह नहीं कि इंसान ह़लाल माल, कारोबार या ने'मतों को छोड़ दे। बल्कि ज़ुह्द यह है कि: *दुनिया दिल में न हो, हाथ में हो।* *अल्लाह की रज़ा को दुनियां के फ़ायदे पर तरजीह दे।* *ने'मत मिले तो शुक्र करे, न मिले तो सब्र करे।* *ह़राम और बेकार चीज़ों से बचे, और आख़िरत की तैयारी में लगा रहे।* *ह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान रह़मतुल्लाहि अ़लैह ने भी ज़ुह्द का यही मफ़हूम बयान किया है कि दुनिया से दिल न लगाया जाए, न कि हलाल असबाब को बिल्कुल छोड़ दिया जाए।* मुख़्तसर तअरीफ़: *"ज़ुह्द यह है कि दुनिया दिल से निकल जाए, हाथ से नहीं।"* मिन्हाजुल आ़बिदीन (हिन्दी), स. 79 मे भी ज़ुह्द के बयान में ऐसा ही कुछ लिखा गया है ।
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July 16, 2026 298