श्रीकृष्ण : जीवन के हर कुरुक्षेत्र के सारथी
आज भी हमारे जीवन में छोटे-बड़े कुरुक्षेत्र हैं—
कभी करियर को लेकर, कभी रिश्तों को लेकर, कभी सही और सुविधाजनक के बीच, तो कभी अपने डर और अपने सपनों के बीच।
हम भी कई बार अर्जुन की तरह खड़े होते हैं—
क्या करूँ? क्या न करूँ? सही क्या है और गलत क्या है?
शायद इसलिए श्रीकृष्ण आज भी प्रासंगिक हैं।
कृष्ण को केवल मंदिर में खोजने से अधिक जरूरी है कि उनकी दृष्टि को अपने व्यवहार और जीवन में उतारा जाए।
जब निर्णय कठिन हो, तब हमारे विवेक में कृष्ण हों।
जब मन डगमगाए, तब हमारे संकल्प में कृष्ण हों।
जब सफलता मिले, तब हमें अहंकार से बचाने वाले कृष्ण हों।
जब असफलता मिले, तब टूटने के बजाय कर्म की ओर लौटाने वाले कृष्ण हों।
और जब जीवन अपने सबसे कठिन प्रश्न पूछे, तब उनसे भागने के बजाय उनका सामना करने का साहस हमारे भीतर हो।
कृष्ण शायद इसलिए विराट हैं कि वे हमें जीवन से भागना नहीं, बल्कि उसकी पूरी जटिलता के साथ जीना सिखाते हैं।
गीता केवल युद्ध की कथा नहीं है।
यह उस क्षण की कथा है, जब एक टूटता हुआ मन अपने भीतर फिर से खड़ा होता है।
और शायद हम सभी के भीतर एक अर्जुन है—
जिसे जीवन के किसी न किसी मोड़ पर अपने भीतर के कृष्ण की आवाज़ सुननी पड़ती है।
श्रीकृष्ण को पढ़ना ज्ञान है,
श्रीकृष्ण को समझना बोध है,
लेकिन श्रीकृष्ण को अपने आचरण में उतार लेना—
शायद वही वास्तविक जीवन-शिक्षा है।
डॉ. धीर सिंह धाभाई
55September 4, 2026 1.4K 2 3