जीवित त्वचा के तनिक तिली भी पास लगती है तो अनायास चीख निकल जाती है।
वे कौन वीरांगनाएँ थीं, जिन्होंने अपनी शुचिता और प्रतिष्ठा को रौंदे जाने से बचाने के लिए स्वयं को आहूत कर दिया?
क्या उन्हें अपने प्राण प्रिय न थे?
“कूद पड़ी थीं यहाँ हज़ारों पद्मिनियाँ अँगारों पर!”
वे कायर नहीं थीं।
वे इतनी जीवट थीं कि शवों को भी न बख़्शने वाले मलेच्छों के हाथों उनकी राख भी नसीब नहीं हुई थी।
उन शील और चरित्र की प्रतिमूर्तियों पर ये विदूषक प्रवचन देंगे जिनका जीवन केवल देह से आरंभ होकर देह पर समाप्त होता है।
मुस्लिम आक्रांताओं पर आसक्त इन लफ़्फ़ाज़ अभिनेत्रियों को मालूम होना चाहिए कि जीवन केवल अस्थिमज्जा से संचालित नहीं होता।
भारत एक ज़ख़्मी सभ्यता है। जौहर हरे घाव।
ये किसी नई मुल्ली बनी भांड के समझ से परे ही है।
#जौहर
#SwaraBhasker

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