जो छिपाते हैं खुद को मंजर के झरोखों में,
ये जीवन भला उनकी क्या ही कदर करेगा?
डरते हैं किससे? यहाँ कौन है किसका कितना?
जो रखा है छिपाकर, वो हुनर ही बयां करेगा।
क्या खुद को जान लेना, ज़रूरी नहीं लगता?
छोड़ो भी! ये जमाना भला कब ही गौर करेगा?
बारिशें आएँगी, मंज़र साफ़ दिखेगा तुमको;
जिसे अपना कहा, वही कहीं दूर रहा करेगा।
चिरागों की लौ बहुत है, अपने एहसासों के लिए,
तिसनगी का आलम ही, हर लौ को ज़िया करेगा।
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