राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
प्रवचन दिनांक 9 मार्च 2003 प्रातः 5:00 बजे।
*’विषय - परमात्मा सब जगह परिपूर्ण है।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी की वाणी बहुत विलक्षण है, दिव्य (परम वचन) है । श्री’ ’स्वामी जी महाराज जी की वाणी सुनने से हृदय में प्रकाश आता है, इसलिए’ ’प्रतिदिन जरूर सुननी चाहिए।*
परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जी कह रहे हैं कि जो परमात्मा की प्राप्ति चाहते हैं । इसका (परमात्मा का) निर्माण नया नहीं है। इसे बनाना नहीं है। ये पहले से ही है । वो परमात्मा सदा ही पूरे के पूरे हैं। जैसे नृसिंह भगवान् खंभे से प्रकट हुए तो पूरे के पूरे। पूरी शक्ति थी । कोई जाने चाहे न जाने, माने चाहे न माने, कोई स्वीकार करे चाहे न करे। भगवान् के इन बातों का फर्क नहीं है। मैं सब में समान रूप से परिपूर्ण हूं। सब प्राणियों में भी हूं। जैसे प्राणियों में हैं, ऐसे जड़ में भी हैं पूरे के पूरे । खंभे से निकल गए। जानने वाले कहते हैं कि परमात्मा की प्राप्ति में देरी का काम है ही नहीं। बेटा बाप की सब संपत्ति का अधिकारी है। तो भगवान् की पूरी संपत्ति सब के लिए। आप ध्यान नहीं देते। ध्यान दो । बाहर की सामग्री सब दुनिया के लिए है। संसार की चीज संसार को दे दो, योग हो जायेगा। अलग हो जाओ (शरीर को स्वरूप से अलग करना) तो ज्ञान योग हो गया। भगवान् के अर्पण करने से भक्ति योग हो गया ।
साधक होता है तो साध्य की प्राप्ति हो जाती है । साधक साध्य बिना नहीं रह सकता। और साध्य साधक बिना नहीं रह सकता। इस वास्ते वो हमारा है। ममैवांशो ....। अनादि काल से ये मेरा ही अंश है। जीव केवल मेरा ही अंश है । साक्षात् मेरा ही अंश है । हरदम साथ रहने वाला। संसार, धन, जमीन, कुटुंब चाहिए - ये बिल्कुल फालतू चीज। जो बाधा है, विघ्न है उसकी चाहना करते हैं। आप साक्षात् परमात्मा के अंश है। हो जैसे ही परमात्मा के अंश हो। स्थावर, जंगम सब भगवान् ही हैं। भगवान् के सिवाय कुछ नहीं हैं। भगवान् हैं पूरे के पूरे ।सर्व समर्थ परमात्मा हैं, उनके जैसा कोई है नहीं, हुआ नहीं, होगा ही नहीं, होना संभव ही नहीं । ये संसार रहेगा नहीं। इनके लिए रोना पड़ेगा।
*सच्चे हृदय से भक्त जब सच्चा गाय है ।*
*भक्त वत्सल कान में झट पहुंच ही जाय है ।*
सांचे राचे राम।
*ईश्वर अंश जीव अविनाशी।*
*चेतन अमल सहज सुखराशि।।*
साक्षात् परमात्मा का अंश है। ख्याल ही नहीं है। निहाल हो जाओगे। मान बड़ाई सत्कार पूरा प्राप्त नहीं कर सकता। पर परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है। भगवान् प्राणी मात्र के सुहृदय हैं । इस वास्ते सब कामनाओं को छोड़कर भगवान् में लग जाय। प्रेम हो जाय तो बहुत जल्दी प्राप्त हो जाय। नाशवान का महत्व है ये ही बाधक है। सत्ता परमात्मा की ही है। सत् असत् मैं ही हूं। मेरे सिवाय कुछ है ही नहीं। कितनी सुगम, कितनी विलक्षण, उत्तम बात है। मेरे सिवाय कुछ नहीं है। भगवान् ने पूछा- तेरा मोह नष्ट हुआ कि नहीं ? तो कहा कि नष्ट हुआ, आपकी कृपा से । गीता की पढ़ाई से नहीं। मोह नष्ट हो गया। मोह नष्ट होते ही स्मृति हो गई। भगवान् की कृपा का सहारा ले लिया ।सबके लिए सुगम है। कितनी सुगम बात। भगवान् कहते हैं सबके लिए सुलभ है । भगवान् सुलभ हैं और महात्मा दुर्लभ हैं । मैं तो सब जगह हूं। कितनी बढ़िया बात हैं । गीता जैसा ग्रंथ कह रहा है कि वो दुर्लभ महात्मा बन जाय। जिस लाभ की प्राप्ति होने पर उससे बढ़कर लाभ मानने में आता ही नहीं ।वो सबके लिए सुलभ हैं ।जीव मात्र उनका अंश है । और किसी का अंश हमने सुना ही नहीं ।और किसी में योग्यता नहीं है । मनुष्य में योग्यता है । इस वास्ते भगवान् कहते हैं मैं उसके लिए सुलभ हूं।
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*हरि रीझे जग देत है, हरिजन हरि ही देत ।*
इस वास्ते संतों ने कहा है आप दो नंबर हो, एक नंबर संत हैं। सबसे बढ़िया चीज मिली । मौज हो गई । परमात्मा के साथ नित्य युक्त हो जाय। जागे तब से सोवे तब तक । नित्य और निरंतर लगने वाले के लिए मैं सुलभ हूं। लोग चाहे पागल कहो । सिवाय भगवान् के है ही नहीं। वासुदेव: सर्वम् । नया कहां से आवे । वाह प्रभु वाह। खूब उत्साह से नृत्य करे। अरे ! क्या मिल गया। जो मिलना चाहे मिल गया। ऐसे भगवान् हमारे हैं।
नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण !
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