भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।
सतसंगति संसृति कर अंता ॥
भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखोंकी खान है।
परन्तु सत्संग (संतोंके संग) के बिना प्राणी इसे नहीं
पा सकते। और पुण्यसमूहके बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति (जन्म-मरणके चक्र) का अन्त करती है।
~ श्रीरामचरितमानस (उत्तरकाण्ड ४४.३)













