*"हमारे जो बाप वगैरह मर गए हैं उनके लिए हम कुछ कर सकते हैं क्या? यह जो श्राद्ध वगैरा करते हैं हम लोग कर्मकांड, यह क्या है?"*
यह ऐसा है कि कर्मकांड है और यह लोग इसलिए करते हैं कि ना करेंगे तो लोग बुराई करेंगे कि बाप की प्रॉपर्टी तो ले लिया और मरने के बाद श्राद्ध नहीं कर रहा है देखो तो! बाकी कुछ मिलना जुलना नहीं है बाप को। जीव को अपने कर्म का फल मिलता है, दूसरे का किया हुआ नहीं मिला करता है। हमने जो पाप पुण्य या भक्ति की है वो हमको भोगना पड़ेगा। हमारे बाप को, मां को, बेटे को, बीवी को नहीं।
प्रारब्ध सबको भोगना पड़ता है, सिद्ध महापुरूष को भी। अपना कर्मफल अपने को भोगना पड़ता है, दूसरे को दूसरा कर्म नहीं कर सकता। अगर ऐसा होता तो एक महापुरुष सारे संसार का उद्धार कर देता। एक भगवान ही सारे संसार का उद्धार कर देते।
ना! देखो अभिमन्यु उसका बाप अर्जुन गीता ज्ञानी महापुरुष था ना अर्जुन! अरे! उस पर किसको डाउट होगा, भगवान का सखा भी, महापुरुष भी। लेकिन अर्जुन बचा नहीं सके अपने बेटे को। और मामा भगवान श्री कृष्ण अभिमन्यु के सगे। वह भी नहीं बचा सके अभिमन्यु को। अरे! मर गया तो जिंदा कर देते! और ब्याह कराने वाले वेदव्यास यह भी भगवान के अवतार। लेकिन सब बैठ के शोक मना रहे हैं मर गया बेचारा जवानी में। (हंसी...) कोई कुछ नहीं कर सका। और हम लोग क्या करते हैं बड़े काबिल हैं हम लोग। पंडित जी को बुलाया और उनको 100 रुपया दिया और कहा- हमारा बेटा सीरियस है देखो मरने ना पावे! तुम मृत्युंजय का जाप करो। पंडित जी कहते हैं हां! जाप करेंगे वह मरने नहीं पाएगा। अब मर गया तो पंडित जी कहते हैं भाई वो तो मरना ही था लिखा था। पंडित जी आपने तो कहा था कि मृत्युंजय मंत्र का जप करने से मृत्यु पर विजय मिल जाती है!
वेद का एक मंत्र है उसको मृत्युंजय मंत्र कहते हैं -
*त्र्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।* *उर्वारुकमिव बन्धनान्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।*
यह मंत्र है। अब स्वर वगैरा तो पंडित जी जानते नहीं ऐसे ही बोलते हुए जप कर देते हैं- त्र्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
ऐसे करते रहते हैं और लड़का मर गया। अरे जब राम ब्रह्म अपने बाप को नहीं बचा सके तो तुम्हारी क्या हैसियत है। जिसको जब जाना है जाएगा। प्रारब्ध सबको भोगना पड़ेगा। महापुरुष हंस के भोगेगा और संसारी रो के भोगेगा। बस इतना ही अंतर है। जिसको गरीब होना है होगा। प्रारब्ध में लिखा है जिसको अमीर होना है होगा। कितना ही बड़ा पापी हो। पूर्व जन्म में बहुत दान किया है उसने तो उसको उसका फल मिलेगा। और इस जन्म में पाप कर रहा है अरबपति हो के, अगले जन्म में भिखारी बनेगा। ऐसा नियम है भगवान का।
तो अपना-अपना कर्म अपना-अपना भोग। हम श्राद्ध करके अपने बाप को गोलोक नहीं भेज सकते। और फिर नंबर-2, मेन बात क्या है? पूर्वकाल में जो श्रद्धा होता था तो उसमें जो श्राद्ध करने वाला होता था पुरोहित जैसे वशिष्ठ विश्वामित्र, भारद्वाज, गौतम, कपिल, कर्णाद। बड़े-बड़े संत तो यह उस आत्मा को बुलाते थे बशर्ते की जन्म ना हुआ हो कहीं, स्वर्गलोक में हो। बुलाने की शक्ति उन महापुरुषों में थी। वह बुला लेते थे उनको। तो वो खुशबू हमारे पिंड वगैरा का ग्रहण करके थोड़ी देर को जैसे हम किसी आदमी को, भूखा है खाना खिला दिया 5 - 6 घंटे को उसको आराम मिल गया, फिर भूख लगी। मोक्ष वोक्ष की बात नहीं है वो तो भगवत्प्राप्ति करने की बात तो भक्ति के द्वारा अपने आप करने पर होगी। यह टेंपरेरी रिलीफ होती थी। अब जब पंडित जी को पता ही नहीं है हमारा बाप है कहां? जन्म हो गया, कुत्ता बना कि गधा बना कि स्वर्ग में गया। तो वो बेचारे क्या हमको आत्मा को बुला करके पिंडदान का सूक्ष्म भाग देंगे। यह सब बातें सब जोकरी हैं। लोकदृष्टि के हिसाब से लोग करते हैं, करना चाहिए। नहीं तो लोग बुरा मानेंगे और तुम्हारी बुराई होगी फिर तुमको बुरा लगेगा। और नंबर दो इसी बहाने कुछ दान हो जाता है थोड़ा बहुत गरीबों को, यह बात सब अलग है नथिंग से समथिंग अच्छा है लेकिन सिद्धांत याद रखो अपने किए हुए कर्म का फल मिलेगा। दूसरे के द्वारा कर्म कराके और दूसरे को फल नहीं मिला करता। ये महापुरुष लोगों ने कभी-कभी कहीं कहीं किया है। वो नियम का अपवाद है। वो आम नियम नहीं है। इसलिए हम किसी के भरोसे ना रहें। हमारा बाप महापुरुष है, हमारा बेटा महापुरुष है, ठीक है वह गोलोक जाएगा। हमने पाप किया है हम नर्क में जाएंगे। अरे! बाप है बाप वाप तो फिजिकल है। आत्मा का बाप थोड़े ही है वो आत्मा का बाप तो भगवान है। तुम तो उसको भूल गए थे, अब तुमको कैसा गोलोक? तुम्हारे बेटे ने तो जान लिया था भगवान हमारा बाप है और उसने प्यार कर लिया भगवान से, वो गोलोक जाएगा। तुम उसके भरोसे बैठे रहो नहीं चलेगा। बीवी हो, पति हो यह सब स्वर्गलोक तक है और मृत्युलोक तक है। लेकिन तुम मर गए तुम्हारी प्रॉपर्टी बीवी