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*विकलांगता पेंशन को टैक्स के दायरे में लाना निंदनीय*
कुछ दिनों पूर्व घोषित बजट में रक्षा कर्मियों को मिलने वाली विकलांगता पेंशन पर उपलब्ध आयकर छूट को समाप्त कर दिया गया है। बजट के अनुसार, अब से यह छूट केवल उन सशस्त्र बलों के कर्मियों को ही उपलब्ध होगी जिन्हें शरीर की अक्षमता के कारण सेवा के मध्य में "अमान्य" घोषित कर दिया गया था। जो कर्मचारी अपनी पूरी अवधि (सेवानिवृत्ति) पूरी करने के बाद विकलांगता के साथ सेवानिवृत्त हुए हैं, वे अब इस कर छूट का लाभ नहीं ले सकते।
यह एक निंदनीय निर्णय है। एक युवा जब सेना में भर्ती होता है तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होता है। सेना में विभिन्न परिस्थितियों, मौसम और जलवायु में काम करने के कारण यदि शरीर में कोई अक्षमता उत्पन्न होती है तो इसके लिए सेना जिम्मेदार है।
सोचने की बात है कि यदि शारीरिक अक्षमता के होते हुए भी वह सैनिक अपनी निर्धारित सेवा को पूरी करता है तो इसके लिए तो वह बधाई और पुरस्कार का पात्र है। लेकिन केंद्र सरकार ने उसकी विकलांगता पेंशन पर उपलब्ध आयकर छूट को हटा कर उसे दंडित करने का काम किया है।
देश के नीति नियंताओं और सेना के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों को इस विषय पर विस्तार से सोचने की जरूरत है। इस तरह के निर्णय से सैनिकों और सेवानिवृत्त सैनिकों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
सेवा के दौरान शारीरिक रुप से अक्षम होने वाले सैनिकों को प्रशासनिक कार्यों के लिए सेल्टर एपांइंटमेंट देकर सैन्य सेवा में बनाए रखा जाता है। शारीरिक रुप से अक्षम सैनिक वह हर काम करता है जिसे वह कर सकता है, बस वह केवल आपरेशनल एरिया में अपनी सक्रिय भूमिका नहीं निभाता है। जब कोई सेवारत सैनिक ड्यूटी पर घायल और अक्षम हो जाता है, तो जो लाभ उसे मिलते हैं, उनमें विकलांगता पेंशन, जीवन भर के लिए उपचार और अतिरिक्त कर-मुक्त विकलांगता पेंशन शामिल हैं।
विकलांगता पेंशन पर कर छूट सन् 1922 से लागू थी, जिसे अब हटा दिया गया है। आखिर सरकार विकलांग पेंशन प्राप्त करने वाले सैनिकों के दो अलग-अलग वर्ग कैसे कर सकती है जो देश की सेवा करते समय विकलांग हो गए हैं।
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