“दो बार जेल, झूठे केस… फिर भी DSP बने।
उसी सिस्टम के अफ़सर बनकर लौटे, जिसने कभी हथकड़ी पहनाई थी।
पिता का सपना…
जैनेंद्र जेल से लौटकर DSP बन गये।
भिंड के छोटे गाँव डूगरपुरा का लड़का…
घर जला, ज़मीन छीनी गई, झूठे केस बनाकर दो बार जेल…
फिर भी सपना वही रहा
पापा का अधूरा सपना पूरा करना: DSP बनना।
पिता ने खुद 5 बार MPPSC मेन दिया, पर सिस्टम और हालात ने उन्हें अफसर बनने नहीं दिया।
बचपन से बेटे ने उन्हें किताबों और कैसेट के साथ पढ़ते देखा है…
और मन में सिर्फ़ एक लाइन बैठ गई:
“जो पापा नहीं कर पाए, वो मुझे करके दिखाना है।”
गाँव के गुंडों ने ज़मीन हड़पने के लिए उल्टा उन्हीं पर ही क्रॉस FIR करवा दी।
पिता, बेटा, भाई तीनों को हथकड़ी लगाकर कोर्ट से जेल तक जुलूस की तरह ले जाया गया।
20×20 के कमरे में 30 क़ैदी, गंदे कम्बल, गंदी बैरक, दो रोटियाँ और पानी जैसी दाल…
यही थी एक भविष्य के DSP की पहली पोस्टिंग जेल की बैरक।
उसी झूठे केस के बीच 2019 का MPPSC प्री देना था।
हाथ में हथकड़ी, दूसरे में पेन।
सामने प्री का पेपर।
सेंटर पर एक बच्चे ने कहा:
“किसी का सिलेक्शन हो या न हो, इसका तो ज़रूर होगा… क्योंकि जिसने इतना सह लिया, वो सिलेबस से क्या हारेगा?”
जेल से निकलते ही जैनेंद्र और उनके पापा-मम्मी देश घूमने पैदल निकल गए।
कभी मंदिर में सोए, कभी धर्मशाला में, कभी फुटपाथ पर, ठेले के नीचे…
सिर के ऊपर चिंगारियाँ छोड़ता ट्रांसफॉर्मर।
लोग रास्ते में 50–100–200 देकर आगे बढ़ जाते,
और वो उन पैसों से खाना खाकर अगला किलोमीटर चल देते।
फिर दूसरी बार जेल।
पिता पर NSA।
झूठा आरोप “तहसीलदार को मारा।”
किस्मत देखिए वही बेटा बाद में खुद तहसीलदार बना।
8 जनवरी 2021 को बुआ ने ज़मानत कराई।
जेल से निकले 9 जनवरी को दूसरी बुआ ने ATM हाथ में पकड़ाया और बोली:
“गाँव मत रुकना, वरना फिर केस होंगे।
सीधे इंदौर जाओ, DSP बनकर दिखाओ।”
इंदौर में तैयारी शुरू ही हुई थी कि खबर आई
दिल्ली में माता-पिता का प्लान करके एक्सीडेंट करवा दिया गया।
डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए
“जितना समय है, साथ बिताओ।”
जैनेंद्र दिल्ली पहुँचे, माँ के हाथ पर आखिरी वादा लिखकर आए:
“या तो DSP बनकर लौटूँगा… या समझ लेना, तुम्हारा बेटा अब इस दुनिया में नहीं है।”
इंदौर लौटकर उन्होंने खुद के लिए सिर्फ दो चीज़ें तय कीं:
किताबें और कसम।
सुबह 6 से 12 पढ़ाई
1 से 2 न्यूज़पेपर
4 से 8 फिर पढ़ाई
रात में 9 से 2 पढ़ाई
दिन में बस 5–6 घंटे की नींद।
हर पेज के साथ एक ही ख़याल:
“माँ की कसम झूठी नहीं होनी चाहिए।”
पिताजी के पास इंदौर की टिकट के पैसे भी नहीं थे।
कोचिंग, हॉस्टल, किताबें, घर का खर्च, माँ का इलाज
सब कुछ बुआ ने उठाया।
लगभग 8–9 लाख तक, सिर्फ़ एक बात सोचकर:
“ये लड़का हार नहीं मानेगा।”
जैनेंद्र के मन में बार-बार सवाल उठता:
“अगर DSP नहीं बना तो बुआ का ये कर्ज़ कैसे चुकाऊँगा?”
पापा ने ज़िंदगी भर पढ़ा पर कम लिखा
इसलिए मेन्स में बार-बार रुक गए।
बेटे ने वही गलती नहीं दोहराई।
60–70 मेन्स टेस्ट लिख डाले।
कई बार एक ही दिन में 3 टेस्ट।
पहले टेस्ट में 150 में से 45…
आखिरी में हिस्ट्री में 150 में से 110 लाने लगा।
सफलता कोई चमत्कार नहीं थी
ये हर दिन की कलम की मार थी।
जेल से DSP तक, जेल की बैरक, जला हुआ घर, खाली जेब, बीमार माँ,
झूठे केस, दो बार हथकड़ी, दो बार जेल…
इन सबके बाद भी जैनेंद्र ने सिर्फ़ दो चीज़ें नहीं छोड़ीं:
पिता का सपना और अपनी पढ़ाई।
आज वही लड़का MPPSC से DSP बन चुका है,
और उसी सिस्टम को ईमानदारी से चला रहा है
जिसने कभी उसे और उसके पिता को हथकड़ी पहनाई थी।