व्याख्याता राजनीति विज्ञान का परिणाम :
आयोग द्वारा जारी राजनीति विज्ञान के परिणाम में 645 सीट के विरुद्ध कुल जमा 67अभ्यर्थी ही उत्तीर्ण हो पाए , और ये स्थति कई और विषय जैसे फिजिक्स, भूगोल , कोच , प्रोफेसर पोलिटिकल साइंस इत्यादि के साथ भी है। ज़ाहिर सी बात है न्यूनतम अंक का क्राइटेरिया पार नहीं करने दिया गया ।
अब कुछ विकृत मानसिकता के विक्षिप्त लोग कोचिंग अथवा नोट्स अथवा अभ्यर्थी को दोषी बता रहे, कुछ लोग सुझाव दे रहे की मूल पुस्तकें पढ़ी नहीं थी , कुछ ज्ञान दे रहे की पढ़ने वाले अभ्यर्थी रहे नहीं ।ये वो लोग है जिनका राजनीति विज्ञान अथवा संबंधित विषय कोई से संबंध नहीं , कुछ अभ्यर्थियों को कमतर मानते हुए उनका मज़ाक़ बना रहे।यह सबसे आसान काम है जो कोई भी कर लेगा।
पेपर निर्माण का एक मनोविज्ञान होता है जिसमें कठिन , आसान , मध्यम श्रेणी , तथ्यात्मक और अवधारणात्मक सवालों का समावेशन किया जाता है , जिससे सभी मानकों पर खरे उतरने वालें योग्य अभ्यर्थी चयनित हो जाते है , इस तरह के पेपर बेहतर का चयन करने के उद्देश्य से बनाये जाते है न की रिजेक्शन के लिए ।
अगर पेपर सवाल ग़लत करवाने के उद्देश्य से बनाना हो, तो यकीन मानिए मैं पेपर बना दूँ और आयोग का एक भी पेपर सेटर न्यूनतम अंक लेके आ जाएँ तो मान जाऊँगा ! हालाँकि हम लोगों की बात की आँच वहाँ तक नहीं जाती , फिर भी कहेंगे ।
यहाँ अभ्यर्थियों की गलती है नहीं , गलती पेपर बनाने के मनोविज्ञान की हैं, हर विषय असीमित हैं, हज़ारों विद्वान है , हज़ारों पुस्तकें है , हज़ारों विचार है , हज़ारों धाराएँ है , आख़िरी कोई कितना याद करेगा ? ये युक्तिसंगत परीक्षण तो नहीं है। इस तरह एक विषय ख़त्म सा हो जाता है , उबायूँ और डरावना लगने लगता है । समय रहते इस मानसिकता में सुधार जरूरी है ।
आयोग को ऑथेंटिक पुस्तक की सूची दे देनी चाहिए , ताकि कम से कम अभ्यर्थियों को स्रोत तो पता चलें , उस अनुरूप वो तैयारी कर लेगा। बाक़ी विचारणीय है राजनीति विज्ञान के सारे अभ्यर्थी अयोग्य है ? ध्यान रहे ये JRF भी है NET भी है , तो इनके विषय की समझ पर सवाल नहीं उठा सकतें ।
आयोग ने जो सीनियर सेकेंडरी का पाठ्यक्रम दिया उसमे आप तलाश कर लीजिए पाँच सवाल नहीं मिलेंगे फिर किसलिए सीनियर स्तर लिखना ? यही बात स्नातक स्तर पर लागू है ।
✍️ डॉ गणपत सिंह राजपुरोहित