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ज़िद बस उसको पाने की है
हमें कहाँ ज़रूरत ज़माने की है
रिश्ता पुराना भी टूट सकता है
यही कीमत आज़माने की है
बहुत दिनों से देखा नहीं तुझे
यह रुत तेरे शहर आने की है
बच कर रहना ज़माने से ज़रा
बुरी नियत इस ज़माने की है
अच्छी नहीं लगती ख़ामोश तू
तुझे ज़रूरत मुस्कुराने की है
बहुत हो गया नज़रों का मिलाना
अब ज़रूरत बात बढ़ाने की है
बड़ी जंचती है सादगी तुझ पे
तू हस्ती दिल लगाने की है
© आदिल खान...✍🏻