तुम रोज़ सोचते हो — "आज नहीं, कल से।" और वही "कल" कभी नहीं आता। कमी किताबों की नहीं है, कमी सिर्फ़ आज शुरू करने की हिम्मत की है। तुम कहते हो — "आज तबीयत ठीक नहीं," "आज मन नहीं लग रहा।" पर याद रखो, जिस दिन फ़ॉर्म भरोगे, कट-ऑफ़ तुम्हारी तबीयत नहीं पूछेगी — वह सिर्फ़ यह गिनेगी कि तुमने कितने दिन नहीं पढ़ा। तो सुनो — बुखार है? आधा पन्ना ही सही, पढ़ो। बारिश हो रही है? मन नहीं लग रहा? बिना मन के भी बैठ जाओ — आदत आज बनेगी, मन बाद में लग जाएगा। क्योंकि सफलता उस रात मिलती है जब बाक़ी सो जाते हैं और तुम्हें अँधेरे में भी किताब के अक्षर दिखने लगते हैं। "कल" मत ढूँढो — जो करना है, आज, अभी, यहीं से।
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21August 21, 2026 7.4K 35