राखी के दिन घर जाना था… टिकट भी देखी थी, मन भी बहुत था… फिर किताबों… — Maths + GK — TG.ME

राखी के दिन घर जाना था… टिकट भी देखी थी, मन भी बहुत था… फिर किताबों के बीच बैठे-बैठे खुद को समझा लिया— “अभी नहीं… थोड़ा और रुकना है।” घर में बहन राखी सजाएगी, माँ शायद पूछेगी— “इस बार भी नहीं आएगा?” और मैं हँसकर कह दूँगा— “नहीं माँ, तैयारी है ना…” लेकिन सच तो ये है, उस दिन कमरे में किताबें होंगी, मेज़ पर नोट्स होंगे, फोन पर घर की तस्वीर होगी… और आँखों में पूरा घर। बहन की राखी इस बार भी शायद WhatsApp पर एक फोटो बनकर आएगी… कलाई पर बाँधने वाला कोई नहीं होगा, लेकिन उस तस्वीर को देखते ही घर की वो छोटी-सी दुनिया आँखों के सामने आ जाएगी। हम घर से निकले थे सिर्फ नौकरी पाने के लिए नहीं… उस दिन के लिए, जब वापस जाएँ तो माँ से कह सकें— “अब चिंता मत करना… आपका बेटा/बेटी अपने पैरों पर खड़ा हो गया है।” इसलिए इस बार भी राखी दूर से ही सही… कलाई खाली रहेगी, मगर दिल नहीं। ❤️ क्योंकि कुछ राखियाँ हाथ पर नहीं बंधतीं… वो उस सपने से बंध जाती हैं, जिसके लिए कोई अपना घर से इतनी दूर बैठा है। ❤️ # aspirants # copied 😊

August 28, 2026 257 1