❖ खिड़की के उस पार ❖
खिड़की के उस पार 🌤️ हर रोज़ एक नया सफ़र निकलता है,
कोई जल्दी में घर से निकलता है, कोई लौटते हुए थकता है,
कोई हँसता हुआ गुज़रता है, 🙂 और कोई चुपचाप
अपने हिस्से का दिन ढोता है।
मैं देर तक खिड़की पर बैठा रहता हूँ, 🪟
इन चेहरों में ख़ुद को तलाशता रहता हूँ,
कभी लगता है—चल दूँ इनके साथ,
कभी अपने ही कमरे में फिर लौट आता हूँ।
सड़क पर बारिश बरसती है, 🌧️ लोग भीगकर भी चलते हैं,
छोटी-सी छत के नीचे दो अजनबी साथ सिमटते हैं,
और मैं सोचता हूँ—शायद बाहर की दुनिया
इतनी भी कठिन नहीं, जितनी मैंने उसे अपने भीतर बना रखा है। 💭
शाम ढलती है, 🌆 खिड़की पर परछाईं ठहरती है,
बाहर की भीड़ धीरे-धीरे अपने घरों को लौटती है,
और मेरे कमरे में फिर वही ख़ामोशी उतरती है। 🌙
फिर शीशे में अपना चेहरा दिखता है, थका हुआ-सा,
मगर जाने क्यों आज कुछ कहता है—
“दुनिया तो अब भी वहीं है, रास्ते भी वहीं हैं,
बस निकलना तुम्हें है…
खिड़की से बाहर नहीं, अपने भय से बाहर निकलना है।” 🕊️
मैं देर तक मौन रहा, फिर खिड़की खोल दी—
हवा भीतर आई, 🍃 और पहली बार लगा,
शायद ज़िंदगी मुझसे दूर नहीं गई थी…
मैं ही उससे थोड़ा दूर बैठा था। 🤍
— 𝐈𝐧𝐝𝐫𝐚 🖋️🌸