द्वैध शासन स्थापित करने के कारण बक्सर युद्ध (1764) में विजय के पश्चात् कंपनी यदि सीधे ही सत्ता हाथ में ले लेती तो कंपनी का वास्तविक साम्राज्यवादी चेहरा जनता के समक्ष आ जाता, जिससे स्थानीय विद्रोह भड़कने तथा अन्य विदेशी प्रतिद्वंद्वियों के एकजुट होने का अंदेशा था। कंपनी को मुगल बादशाह से दीवानी अधिकार तो मिल गए, किंतु अन्य विदेशी कंपनियाँ उसके इन अधिकारों को चुनौती देते हुए कर (Tax) दैने से मना कर सकती थीं। कंपनी के पास उस समय इतना पर्याप्त संख्या-बल नहीं था कि वह कंपनी के कार्यों के साथ-साथ बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था सँभाल सके। साथ ही, कंपनी के पास जो कर्मचारी और अधिकारीगण थे, वे भी स्थानीय रीति-रिवाज़ व परंपराओं से अनभिज्ञ थे। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स उस समय प्रादेशिक नियंत्रण करने की अपेक्षा अधिकाधिक आर्थिक लाभ की आकांक्षा रखते थे। सीधे प्रशासनिक उत्तरदायित्व लेने पर आर्थिक लाभ में कमी की भी संभावना थी। इसके अतिरिक्त राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने पर उन्हें इंग्लैंड की संसद के हस्तक्षेप का भी भय था।
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