कौन सी बात परीक्षक को क्लिक कर जाए…
प्रिय, विद्यार्थियों ! लिखित परीक्षाओं का दौर शुरू हो चुका है। उम्मीद है धीरे धीरे इसे हर परीक्षा में लागू किया जाए। मुझे अपनी एम.फिल (JNU) की कक्षा याद आ रही है जिसमें रिसर्च मेथाडोलॉजी पढ़ाई जा रही थी। पढ़ाने वाले प्रोफेसर प्रेमचंद विशेषज्ञ थे, शिवप्रसाद सितारे हिन्द पर पुस्तक लिख चुके और झारखंड रत्न से सम्मानित हो चुके थे। हमारे लिए बड़े प्रोफेसर थे। उनकी बातों से लगा कि इस बार के एम.फिल प्रवेश परीक्षा का पेपर उन्होंने ही बनाया था। उनके प्रश्न तुलनात्मक हुआ करते थे : सिद्ध-नाथ, कबीर-तुलसी, कबीर-जायसी, बिहारी-घनानंद, प्रेमचंद-प्रसाद और हिन्दी-उर्दू विवाद। एक दिन कक्षा लेते हुए उन्होंने पूछा कि इसमें वह कौन सा छात्र है जिसने हिन्दी - उर्दू विवाद वाले प्रश्न के उत्तर में लिखा था - ‘भाषा की कोई फैक्ट्री नहीं होती’...वह अपने देश, काल और वातावरण से निर्मित होती है। …उसी विद्यार्थी को मैंने उच्चतम 64 अंक (70 में से) दिया है। कक्षा में बैठे मेरे एक सहपाठी अपना हाथ उठाते हुए संकेत करते हैं कि वह छात्र मैं ही हूं। प्रोफेसर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा - ‘हूं।’ उनको वह वाक्य क्लिक कर गया उन्होंने उस उत्तर में मौलिकता ढूंढ ली। अक्सर लिखित परीक्षाओं की तैयारी शांत-चित्त अवस्था की माँग करती है। कुछ एक मौलिक विचार परीक्षक को अपनी तरफ खींच लेते हैं। वरना पढ़ने के लिए तो सभी कुछ कॉमन किताबों और शिक्षकों से पढ़ते हैं। …हमारे जिस सहपाठी ने उस वाक्य को लिखा था उन्हें देखने से बिल्कुल यह अहसास नहीं होता था कि वे इस तरह की मौलिक बात लिख सकते हैं। कक्षा में वे न के बराबर बोलते थे। यही फर्क होता है, न बोलने वाले ही अच्छा लिखते हैं। यह भी देखने में आता है कि शिक्षक कक्षा में ठीक पढ़ाये या न पढ़ाए वह मूल्यांकन बहुत जबरदस्त करता है। ऐसे ही परीक्षकों के हाथ में आपकी कॉपी जाती है।…मुख्य परीक्षाओं में तथ्यों को रटने के साथ क्रमिक परिवर्तन की समीक्षा करते हुए कुछ मौलिक चिंतन का समावेश कीजिए। यह अभ्यास और शांतचित्त मन से होगा।…कई बार पेज भरने से अंक नहीं मिलते कंटेंट क्लिक करने से भी अंक मिलते हैं जो परीक्षक को बाँध ले।…यह अनुभव अनमोल हैं, इनकी कोई कीमत नहीं चुका सकता।…😊
@डॉ रजनीश
July 30, 2026 6.4K 18 9