कहते हैं कि दौर तो वही पसंद आता है जो खुद का रहा हो...
लेकिन फिर भी आज के दौर में कुछ तो है जो सोचने पर मजबूर करता है ।
शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों वर्ग जिस तरह अपनी अपनी भूमिकाओं में अतिआत्मविश्वासी लेकिन कहीं अंदर से असहज से मालूम होते हैं तो मुझ जैसे साधारण से शिक्षक के मन के किसी कोने में बैचेनी का बीज प्रस्फुटित होने को तैयार सा मालूम पड़ता है ।
जैसे आज शिक्षक अपनी एकमात्र भूमिका से संतुष्ट नहीं है और विस्तारवादी सोच से प्रेरित होकर विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का आकांक्षी है,शिक्षार्थी भी अध्ययन क्षेत्र में ही अलग अलग संभावनाओं पर अपना समय व्यतीत कर रहा है ।
धैर्य,सहनशीलता,परिश्रम,एकाग्रता जैसे शब्द अब अप्रचलित और एक विशेष समूह में अप्रासंगिक प्रतीत होते हैं ।
"कल हो ना हो" जिस भावार्थ के साथ आत्मसात किया गया है लगता है पुस्तकों को दिल से लगाना शायद मस्ती में अभूतपूर्व व्यवधान है ।
शिक्षक मौलिकता से दूर जिस अध्यापन शैली के साथ विद्यार्थियों के समक्ष आता है...लगता है विद्यार्थियों ने यदि दो-तीन बार करतल ध्वनि से किसी गहरी लेकिन अनर्गल बात का स्वागत नहीं किया गया तो शायद कुछ तो कमी रह गई आज के Content में जिसे Like और Share नहीं किया गया ।
आज के लिए विचारों को विराम देते हैं😊
साधुवाद इतने धैर्य से अंत तक पढ़ने के लिए🙏
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1August 12, 2026 1.9K 1