बेरोज़गारी में इश्क़/ केशव तिवारी
जो दिन हमारी घोर दरिद्रता के थे
वही हमारे प्रेम करने के भी थे
एक ख़ाली जेब आशिक़ का दर्द
हमारी ही बिरादरी के कुछ आशिक़
बख़ूबी समझते थे।
दुनिया की नज़र में भले ही हम
फ़ुरसतिया थे पर हम
प्रेम की एक उदात्त अनुभूति को जी रहे थे
फिर भी
बेरोज़गारी में इश्क़ था ये दोस्त
ख़ाली जेब उससे मिलते और
भरे मन वापस लौट आते।
32August 8, 2026 7.4K 7