*कुछ दर्द कहे नहीं जाते…*
सबसे ज्यादा दर्द तब होता है,
जब मन के भीतर बहुत कुछ चल रहा हो…
और दिल चाहता हो कि किसी से बात करें,
किसी के सामने बस थोड़ा-सा टूट जाएँ…
लेकिन फिर लगता है—
“कहीं मैं किसी को परेशान तो नहीं कर दूँगा?”
और हम फोन हाथ में लेकर भी किसी को मैसेज नहीं करते।
किसी का नंबर देखकर वापस स्क्रीन बंद कर देते हैं।
फिर चुपचाप अकेले बैठ जाते हैं…
बाहर से बिल्कुल सामान्य,
लेकिन भीतर हजारों सवालों और अनकहे एहसासों का शोर होता है।
कभी-कभी इंसान को सलाह नहीं चाहिए होती,
कोई समाधान भी नहीं चाहिए होता…
बस कोई इतना कह दे—
“मैं हूँ… बोलो, क्या हुआ?”
और शायद यही एक वाक्य
किसी के भीतर चल रही पूरी लड़ाई को
थोड़ा आसान कर देता है
डॉ. धीर सिंह धाभाई
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