आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।।
-ब्रह्मपुराण/अ-1/श्लोक-38
विष्णुपुराण के अनुसार इस समग्र संसार के सृष्टि कर्ता ‘ब्रह्मा’ का सबसे पहला नाम नारायण है। दूसरे शब्दों में में भगवान का ‘जलमय रूप’ ही इस संसार की उत्पत्ति का कारण है-
जल रूपेण हि हरिः सोमो वरूण उत्तमः।
अग्नीषोममयं विश्वं विष्णुरापस्तु कारणम्।।
-अग्निपुराण /अ.-64/श्लोक 1-2
‘हरिवंश पुराण’ भी इसकी पुष्टि करता है कि ‘आपः’ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। ‘हरिवंश’ में कहा गया है कि स्वयंभू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से सर्वप्रथम ‘जल’ की ही सृष्टि की। फिर उस जल में अपनी शक्ति का आधीन किया जिससे एक बहुत बड़ा ‘हिरण्यमय-अण्ड’ प्रकट हुआ। वह अण्ड दीर्घकाल तक जल में स्थित रहा। उसी में ब्रह्माजी प्रकट हुए-
ततः स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्।।35।।
हिरण्य वर्णभभवत् तदण्डमुदकेशयम्।
तत्रजज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयंभूरिति नः श्रुतम्।। 37।।
इस ‘हिरण्यमय अण्ड’ के दो खण्ड हो गये। ऊपर का खण्ड ‘द्युलोक’ कहलाया और नीचे का ‘भूलोक’। दोनों के बीच का खाली भाग ‘आकाश’ कहलाया। स्वयं ब्रह्माजी ‘आपव’ कहलाये-
‘उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य ज्ञज्ञिरे।
आपवस्य प्रजासर्गें सृजतो ही प्रजापतेः।।49।।’
अर्थात्- इस प्रकार प्रजा की सृष्टि रचते हुए उन ‘आपव’ (अर्थात् जल में प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्मा के अंगों में से उच्च तथा साधारण श्रेणी के बहुत से प्राणी प्रकट हुए।
-हरिवंश/हरिवंश पर्व/प्रथम अध्याय
‘जल’ केवल ‘नारायण’ ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु और महेश (रूद्र) तीनों है।
‘वायु पुराण’ के अनुसार जल शिव की अष्टमूर्तियों में से एक है। दूसरे शब्दों में ‘रूद्र’ की उपासना के लिए जो आठ प्रतीक निर्धारित हैं उनमें से एक जल है-
ततोSभिसृष्टास्तनव एषां नाम्ना स्वयंभुवा।
सूर्यो मही जलं वह्निर्वायुराकाशमेव च।।
दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येते ब्रह्मघातवः।
तेषु पूज्यश्च वन्द्यः स्याद् रुद्रस्तान्न हिनस्तिवै।।
ये आठ प्रतीक क्रमशः सूर्य, मही, जल, वह्नि(पशुपति), वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र हैं। रूद्र की जो आठ मूर्तियाँ निश्चित हैं, उनकी पूजा (क्रमशः) सूर्य (रूद्र), मही (शर्व), जल (भव), वह्नि (पशुपति), वायु (ईशान), आकाश (भीम), दीक्षित ब्राह्मण (उग्र) तथा चन्द्र (महादेव) में करने से रूद्र कभी भी उपासक को हानि नहीं पहुँचाते।
इनमें शिव का जो ‘रसात्मक’ रूप है वह ‘भव’ कहलाता है और जल में निवास करता है। इसलिए ‘भव्’ और ‘जल’ से सम्पूर्ण भूत समूह (प्राणी) उत्पन्न होता है और वह सबको उत्पन्न करता है। अतः ‘भवन-भावन-सम्बंध’ होने के कारण ‘जल जीवों का संभव’ कहलाता है-
यस्माद्भवन्ति भूतानि ताम्यस्ता भावयन्ति च।
भवनाद्भवनाच्चैव भूतानां संभवः स्मृतः।।22।।
इसी कारण कहा गया है कि जल में मल-मूत्र नहीं त्यागना चाहिए। न थूकना चाहिए। नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिए। जल में मैथुन नहीं करना चाहिए। शिरः स्नान नहीं करना चाहिए। स्थिर या बहते हुए जल के प्रति कोई अप्रीतिजनक बात नहीं कहनी चाहिए। पवित्र या अपवित्र शरीर के स्पर्श से जल कभी-भी दूषित नहीं होता। किन्तु मटमैले, विरस, दुर्गन्धित और थोड़े जल का उपयोग नहीं करना चाहिए।
समुद्र जल का उत्पत्ति स्थान है। इसलिए जलराशि समुद्र की कामना करती है। जल समुद्र को पाकर पवित्र और अमृतमय हो जाता है। बहते हुए जल को रोकना नहीं चाहिए। क्योंकि वह समुद्र में जाना चाहता है। इस प्रकार ‘जल तत्त्व’ को जानकर जो जल में रहता है, उसकी ‘हिंसा’ भव-देवता नहीं करते हैं।
भगवान् महादेव ही अमृतात्मा जलमय चन्द्रमा कहे जाते हैं। (महादेवोSमृतात्माSसौ द्यृम्मयश्चन्द्रमाः स्मृतः)।
जलरूप भव की पत्नि ‘उषा’ और पुत्र ‘उशना’ माने गये हैं- भवस्य या द्वितीया तु तनुरापः स्मृता तु वै। तस्योषाSन्न स्मृता पत्नी पुत्रश्चाप्युशना स्मृतः।।
-वायुपुराण/अ.-27/श्लोक-50
पुराणों और स्मृतियों के अनुसार ‘जल’ आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक तीनों रूपों में विद्यमान है।
वेदों में जल को ‘आपो देवता’ कहा गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद – इन तीनों संहिताओं में, यद्यपि जल के लिए पूरे एक सौ पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त हुए हैं, तथापि सर्वाधिक प्रयोग ‘आपः’ शब्द का हुआ है, इसका करण हैवस्तुत: आपः शब्द ‘आप्’ धातु का विकसित रूप है। आप् धातु का प्रयोग व्यापक होने, फैलने एवं सर्वत्र विद्यमान रहने के अर्थ में किया जाता है। दूसरे शब्दों में, जो सर्वव्यापी है, जो फैल सकता है और जो सर्वत्र विद्यमान है, वह ‘आपः’ कहलाता है। ये तीनों लक्षण क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश के वाचक हैं। अतः वेदों में यदि जल को ‘आपो देवता’ कहा गया है तो ठीक ही है। वह पूर्ण उपयुक्त है। साथ ही उपवृंहण करने पर पुराणों की विचारधारा से भी मेल खाता है।