मैं इतना ख़ामोश हो जाऊँ कि आवाज़ भी न हूँ, जो ढूँढने निकले मुझे, उसे अपना पता भी न दूँ ।
थक गया हूँ रिश्तों की भीड़ में मुस्कुराते-मुस्कुराते, अब किसी को अपने दर्द का सिलसिला भी न दूं।
जो छोड़ गए बीच सफ़र में, उनसे कोई शिकवा नहीं, बस इतना हो कि फिर कभी उन्हें अपना रास्ता भी न दूँ।
मेरी तन्हाई ही अब मेरी सबसे वफ़ादार है, मैं किसी और को दिल में दोबारा जगह भी न दूँ।
अगर कभी मिलू मैं उनसे, तो बस अजनबी बनकर, ताकि उन्हें मेरे टूट जाने का पता भी न दूँ।









