कभी-कभी मैं ये सोचता हूँ
कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो—
तो ऐसा लगता है
दूसरी ओर जा रहे हैं।
मगर हक़ीक़त में
पेड़ अपनी जगह खड़े हैं।
तो क्या ये संभव है
सारी सदियाँ—
कतार के भीतर कतार अपनी जगह खड़ी हों,
यह समय साक़त हो,
और हम ही गुजर रहे हों
इस एक लम्हे में।
सारे लम्हे,
तमाम सदियाँ छिपी हुई हों।
न कोई आने वाला,
न गुज़रा हुआ।
जो हो चुका है,
जो हो रहा है,
जो होने वाला है—
हो रहा है।
मैं सोचता हूँ
कि क्या ये संभव है,
सच यह हो
कि सफर में हम हैं;
गुज़रते हम हैं—
जिसे समझते हैं हम,
गुज़रता है,
वो ठहरा हुआ है।
गुज़रता है या ठहरा हुआ है,
इकाई है या बँटा हुआ;
क्या यह मँज़मّد है
या पिघल रहा है।
किसे खबर है,
किसे पता है—
यह समय क्या है?
23July 4, 2026 1.8K 5